इन दिनों बुलडोजर काफी सुर्खियों में छाया हुआ है। बुलडोजर का मतलब यमदूत का
मशीनी संस्करण जो किसी वैध अपराधी या अवैध इमारत का एनकाउंटर कर रहा है। योगी के
राज्य उत्तर प्रदेश से शुरू इसकी यात्रा मध्य प्रदेश, राजस्थान होते हुए दिल्ली को
आ गई है।
ये लोग यहां मेट्रो लाइन के नीचे झुग्गी झोपड़ी बनाकर अपना गुजर-बसर करते है। हर झोपड़ी में कम से कम चार सदस्यों का एक परिवार रहता है, किसी- किसी परिवार में पांच और किसी में छह सदस्य लोग भी रहते है। इस तरह इस अतिक्रमण से सैकड़ों लोगों के सर से छत उजड़ गया। इसके अलावा उनका रोजगार भी छिन रहा है। वहां के ज्यादातर परिवार के पुरुष वहीं फूलों की नर्सरी की खेती करते हैं जो उनकी आय का प्रमुख स्रोत है। महिलाएं आसपास के घरों में मजदूरी करके अपना परिवार चलाती हैं।
ये लोग यहां पिछले 6 सालों से रह रहे हैं। अब उन्हें यहां से भगाया जा रहा है। झोपड़ी तोड़ने के पीछे की वजह के बारे में डीडीए अधिकारी बताते है कि यहां रिवर फ्रंट परियोजना बनेगा। और इसकी राह में अड़चन बन रहे हर तरह के अतिक्रमण को हटाया जा रहा है। इसके अलावा उस क्षेत्र का सुंदरीकरण कर वहां पार्क और जोगिंग ट्रैक बनाने की भी योजना है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि यहां रहने वाले सारे लोग अब कहां जाएंगे ? ठीक है सरकार यहां रिवर फ्रंट परियोजना और जोगिंग ट्रैक बनाएगी पर इन लोगों के सर पर छत देना भी सरकार का ही काम है।
इससे पहले भी जब ये
लोग सड़क के उस पार रहते थे। वहां अतिक्रमण कर हटाया गया उसके बाद ये लोग यहां
(वर्तमान में जहां अभी रह रहें हैं) आएं। अब यहां से भी
उन्हें भगाया जा रहा है। आखिर ये लोग कहां जा कर रहे ?
इन झोपड़ियों में रहने वाली निशा वर्मा बताती है कि डीडीए वाले कभी भी अचानक बुलडोजर लाकर हमारी झोपड़ी तोड़ देते हैं। झोपड़ियां तोड़ने का कारण पूछने पर अधिकारी कहते है कि सरकार की जमीन है आप लोग यहां नहीं रह सकते हैं। इस पर निशा का कहना कि काम की तलाश में मेरे पति यहां आए। वो यहीं फूलों की नर्सरी में काम करते है, जिससे मेरा घर चलता है। डीडीए वाले यहां से भगा रहे हैं, अब हम कहां जाए और क्या करेंगे। निशा वर्मा
निशा वर्मा आगे बताती हैं कि एक दिन तो हद ही हो गई। डीडीए वाले अचानक बुलडोजर लाए और झोपड़ियां तोड़ने लगें। मैं खेतों में काम कर रही थी। तभी मुझे किसी ने बताया कि डीडीए वाले आए है, घर तोड़ रहे है। मैं दौड़ती- भागती अपनी झोपड़ी की तरफ गई। उसमें मेरी चार साल की बेटी सो रही थी। मैंने झट से उसे अपनी गोद में उठाया और इस तरह मेरी बच्ची बाल- बाल बच गई। वरना शायद वो आज हमारे बीच ना होती। यह बताते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए और वो रोने लगीं।
मालती नाम की एक अन्य महिला बताती हैं कि पानी का एकमात्र साधन वहां एक नल था । उसे भी अतिक्रमण के दौरान तोड़ दिया गया। अब उन लोगों को पानी के लिए काफी दूर जाना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा के बारे में बताती है कि यहां के सारे बच्चे पास के सरकारी स्कूल में जाते हैं। कोरोना काल में स्कूल बंद होने से उनके बच्चों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ा। वो सारा दिन बस खेलते रहते थे। अब वो भगवान से प्रार्थना करती है कि फिर से कोरोनावायरस ना आए, लॉकडाउन ना लगे।
सरकारी योजनाओं के बारे में बताती हैं कि उन्हें किसी भी सरकारी योजना मसलन प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, पीएम जन-धन जीरो बैलेंस खाता योजना और श्रम कार्ड योजना जैसी किसी भी योजना का लाभ नहीं मिलता।
ऐसे में वहां के लोग सरकार से काफी गुस्सा है। उनका कहना है कि सरकार सिर्फ अमीरों के लिए है हम गरीबों के लिए नहीं। आप जैसे लोग आते हैं, हमारा हाल जानते है। हमारी हालात पर फाइलें बनाते हैं। फाइलें दबकर रह जाती हैं हमारी स्थिति जैसी की तैसी बनी रहती है। यहां रह रहे लोगों का सरकार से सिर्फ एक सवाल है कि क्या हमें रहने के लिए कहीं जमीन मिलेगी ? दोपहर की कड़कड़ाती धूप में वो लोग अपना टूटा हुआ आशियां बना रहे थे ।
सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवसपमेंट गोल-एसडीजी) की रिपोर्ट के अनुसार 31% आबादी शहरों में रहती है। उसमें भी 17% आबादी झुग्गी झोपड़ियों में रहती है। देश की इतनी बड़ी आबादी अभी भी सम्मानजनक जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, सफाई, सवास्थय सेवा और बच्चों की शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जद्दो- जहद कर रही है।





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